आज निवेदन कर रहा नरेंद्र से, विकल सवर्ण सब सहकर।
कितनी रक्त -रंजित अश्रु धाराएं, और गिरायेगा इन आखों से बह कर।
बोलो - हे नरेंद्र तू ही तो इस कृत का नामी है ?
संस्कार सवर्ण कुचल कर, तू कैसे विश्व गुरु का कामी है ?
याद कर; तू जीत पाया था सब को, अपनी कर्तव्यता के बल से,
स्वर्ण क्या सब का हिस्सा नहीं? ये कैसे किया, ये कैसा छल है?
तू कैसा नर है, कैसा इन्द्र है ?
जब राजनीति के यौवन पर, क्या क्या कहला रहा था ?
याद कर, सब से पृथक रहा है;
परञ्च अब तो खास नहीं, पृथक नहीं।
अब तो वोट वोट चिल्लाता है, वोट वोट खाता है।
उम्मीद धुंधला रही, झूठला रही, इठला रही,
अगर स्पंदन उठे तेरे मन में, शायद नरेंद्र बन कर ही कुछ कर दे;
कुछ तो पीड़ा हर ले, पृथक पथिक बन कर।
माना शूल होंगे इस पथ पर;
तू सृजनकार कहलायेगा इतिहास के पन्नो पर।
बच पायेगा बनने से भागी, इन रक्त रंजीत अश्रु धाराओं के।
नहीं तो हे इन्द्र - तू आम ही कहलायेगा;
तू सोच जरा, क्या ऐसा भार सह पायेगा?